समाज सेवा (Samaj Sewa)

Samaj Sewa

समाज सेवा (Samaj Sewa)

प्राचीनकाल की बात है। एक गांव में पानी की गंभीर समस्या थी। दूर-दूर तक न तो कोई नदी थी, न ही तालाब व कुआं। इसलिए लोगों को मीलों दूर चलकर पानी लाना पड़ता था। इससे उनको काफी कठिनाई होती थी।

उसी गांव में एक वृद्धा अपनी पुत्री के साथ रहती थी। उसके पति की काफी पहले मृत्यु हो गई थी। वे बहुत ही गरीब थे। हालांकि उस वृद्धा का पति एक जोड़ी बैल और दो-तीन बीघा जमीन उनके लिए छोडकर गया था, लेकिन वे उस प खेती करने में असमर्थ थीं, अत: दोनों मां-बेटी गांव के लोगों के छोटे-मोटे काम करके अपना गुजारा कर लेती थीं।

एक दिन एक समाज सेवक उस गांव में आया और उसने कुछ गरीबों को अनाज व वस्त्र बांटे। वह उस वृद्धा के घर भी गया। वहां उस समय वृद्धा नहीं थी। समाज सुधारक ने उसकी पुत्री से अनाज और वस्त्र लेने का आग्रह किया, किंतु उसने मना कर दिया और कहा, "जब तक हाथ-पैर सलामत हैं तब तक मांगकर खाना पाप है।"

उसकी बात सुनकर समाज सुधारक ने कुछ नहीं कहा। उधर वृद्धा कुछ मजदूरों के साथ एक स्थान पर कुआ खुदवा रही थी। समाज सुधारक ने गांव के लोगों से उस वृद्धा के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि यह उसी लड़की की मां है जिसने अन्न-वस्त्र लेने से इंकार कर दिया था।

समाज सुधारक उस वृद्धा के पास गया और बोला, “माताजी, मैं गरीबों की मदद, करने के उद्देश्य से इस गांव में आया हूं। मैं चाहता हूं कि आप भी कुछ अनाज  और वस्त्र ले लें।"

"बेटा। इस गांव की सबसे बड़ी जरूरत पानी है। लोगों को पानी के लिए दूर दूर  तक भटकना पड़ता है।" वृद्धा ने कहा।

“अच्छा, तभी आप कुआं खुदवा रही हैं, लेकिन आपने इसके लिए धन की  व्यवस्था कहां से की?" समाज सुधारक ने पूछा।

“बेटा! मेरी जमीन और बैल मेरे लिए बेकार ही थे, इसलिए मैंने उन्हें बेच दिया और यह कुआं बनवा रही हूं।" वृद्धा ने कहा।

“किंतु अब आप अपना गुजारा कैसे करेंगी?" समाज सुधारक ने आश्चर्य करते हुए पूछा।

"हमारा क्या है, हाथ-पैर सलामत रहें तो मेहनत-मजदूरी करके दो समय का भोजन जुटा ही लेंगे, लेकिन इस कुएं से गांव का तो भला हो जाएगा।"

वृद्धा की बात सुनकर वह समाज सुधारक अपनी समाज सेवा को बहुत ही तुच्छ समझने लगा। अब उसकी नजर में उससे बडी समाज सुधारक वह वृद्धा थी। 

वह समाज सुधारक उसके आगे नतमस्तक हो गया।

कथा-सार 

यह ठीक है कि अन्न-वस्त्र उस निर्धन वद्धा और उसकी  पुत्री  की  समस्या को  सरल कर देते, लेकिन वे दोनों तो स्वाभिमानिनी थीं; और स्वाभिमान दान कैसे स्वीकार कर सकता है। वृद्धा की दृष्टि में उन अन्न-वस्त्रो से जरूरी था  पानी , जो वह अपना सबकुछ बेचकर गांव में लाने का प्रयास कर रही थी  भलाई ऐसी करें जिससे सबका भला हो।

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