सच्ची ईद (Sachi Eid) (Motivational Stories)

सच्ची ईद (Sachi Eid) (Hindi Kahani)

सच्ची ईद (Sachi Eid) (Motivational Stories)

रमजान का महीना शुरू हो गया था। लोग रोजे रखने लगे थे। दस साल का नन्हा असलम भी रोजा रखने की जिद करने लगा। उसकी अम्मी ने उसे बहुत समझाया, "बेटा, अभी तुम बहुत छोटे हो। रोजे में दिन भर कुछ भी नहीं खाया जाता। अभी तुम्हारी उम्र ही क्या है। जब तुम बड़े हो जाओगे, तब रोजे रख लेना। वैसे भी गरीबी के कारण हमारे तो साल भर ही रोजे रहते हैं।"

इतना समझाने पर भी असलम नहीं माना। उसने अपने दोस्तों से सुन रखा था कि जो रमजान के महीने में रोजे रखता है, अल्लाताला उसे अपने बेटे की तरह मानते हैं और बहुत प्यार करते हैं। उसे ईद में नए-नए कपड़े पहनने को मिलते हैं। ईद और नए कपड़ों का ध्यान आते ही असलम का मन खुशी से भर गया। उसका उत्साह दुगना हो गया। उसने तय कर लिया कि वह रोजे जरूर रखेगा। वह सोचने लगा कि वह हमेशा पुराने कपड़े ही  पहनता रहता है। उसके दोस्तों के कपड़े कितने अच्छे होते हैं! उसकी अम्मा उसे कभी नए कपड़े लेकर नहीं देती। लेकिन इस बार ईद में वह ज़रूर नए पकड़े लेगा।

उसने तो अपने लिए नए कपड़े पसंद भी कर लिए थे। रहीम चाचा की दुकान पर टँगा कुर्ता-पायजामा उसे बहुत पसंद था और उसके ऊपर टंगी जरी की कढ़ाई वाली सदरी तो उसे अपनी तरफ खींचने लगती थी। 

रोज स्कूल जाते समय इस दुकान के सामने उसके कदम खुद-ब-खुद रुक जाते। कुछ देर तक तो इन कपड़ों से उसकी नजर ही नहीं हटती थी। वह सोचने लगता कि ईद वाले दिन यह कुर्ता-पायजामा और सदरी पहनकर वह कितना अच्छा लगेगा, अपने सारे दोस्तों से अच्छा! उसने पक्का इरादा कर लिया कि चाहे जो हो, वह इस बार अपनी अम्मी से जिद करके ये कपड़े जरूर खरीदेगा।

असलम अपनी अम्मी के साथ रहता था। उसके अब्बा का इंतकाल हो चुका था। उसके और कोई भाई-बहन नहीं थे। असलम की अम्मी दिनभर चिकन के कपड़ों पर कढ़ाई करती थीं। उससे जो थोड़े-बहुत पैसे मिलते, उससे किसी तरह रूखी-सूखी रोटी और असलम की पढ़ाई चल रही थी। असलम और उसकी अम्मी गरीबी और तंगहाली में मेहनत करके गुजर-बसर कर रहे थे। असलम की अम्मी हमेशा सोचतीं कि असलम जब पढ़-लिख जाएगा और बड़ा होकर कमाने लगेगा, तो उनके सब कष्ट दूर हो जाएंगे। इसीलिए वे घर की हालत ठीक न होने के बावजूद भी मेहनत कर असलम को पढ़ा रही थीं।

असलम ने रोजे रखने शुरू कर दिए थे। वह सुबह चार बजे अपनी अम्मी के साथ उठ जाता। जो कुछ थोड़ा-बहुत अम्मी बना देतीं, चुपचाप खा लेता। फिर दिन भर वह कुछ भी मिल नहीं खाता, पानी तक नहीं पीता। इसी बीच वह स्कूल भी जाता। यह देखकर उसकी अम्मी को चिता होने लगती। वे असलम को समझातीं कि बच्चों के लिए पानी पीने और थोडा- बहुत खाने की छूट होती है, पर वह नहीं मानता और शाम को अपनी अम्मी के साथ ही रोज़ा खोलता।

असलम ने अपनी अम्मी को बता दिया था कि वह इस बार ईद पर नए कपड़े जरूर लेगा। उसकी अम्मी भी चाहती थीं कि उनका बेटा ईद पर नए कपड़े पहने, पर कहाँ से आएँ नए कपड़े? कैसे खरीदेंगे? उसकी हालत ऐसी नहीं थी।

एक दिन अपनी अम्मी के साथ बाज़ार जाते समय असलम ने रहीम चाचा की दुकान । पर टॅग कपड़े अम्मी को दिखाए और ईद पर यही कपड़े लेने की ज़िद की। फिर वह अपनी  अम्मी को खींचकर रहीम चाचा की दुकान पर ले गया। उसकी अम्मी ने डरते-डरते रहीम चाचा से कपड़ों के दाम पूछे। दो सौ रुपये सुनकर उनका कलेजा धक से रह गया। वे चुपचाप असलम को लेकर घर वापस लौट आईं। रास्ते भर असलम उन कपड़ों की तारीफ़ करता रहा।

असलम की इच्छा और उन कपड़ों के प्रति उसका मोह देखकर असलम की अम्मी सोच में पड़ गईं। वे अपने बेटे का दिल तोड़ना नहीं चाहती थीं, पर दो सौ रुपये के कपड़े खरीदना उनके बस में नहीं था। आखिर उन्होंने बहुत सोच-विचारकर तय किया कि दो सौ रुपये नहीं तो कम से कम एक सौ रुपये का जुगाड़ करके वे असलम को ईद में नए  ज़रूर लेकर पहना देंगी।

अब असलम की अम्मी ने और अधिक काम करना शुरू कर दिया। वे सबह जल्दी उठकर कढ़ाई का काम शुरू कर देतीं। दिनभर और फिर रात देर तक कढाई करती रहतीं।

एक तो रोज़ा, ऊपर से दुगुनी मेहनत, इसका असर उनकी सेहत पर पड़ने लगा। पर उन्हें तो ईद से पहले नए कपड़े खरीदने के लिए रुपये इकट्ठे करने की धुन सवार थी।

आज असलम बहुत खुश था। ईद में केवल एक दिन बाकी था और हाथ में परे दो सौ रुपये थे। उसकी अम्मी ने दिन-रात एक करके, पूरे दो सौ रुपये इकटठे कर लिए थे। उसकी अम्मी की तबीयत कुछ ठीक नहीं थी, इसलिए उन्होंने रुपये देकर असलम को रहीम चाचा की दुकान से वही कपड़े लेने भेज दिया।

रुपये लेकर असलम रहीम चाचा की दुकान की तरफ़ तेज़ी से बढ़ा चला जा रहा था। उसके मन में खुशी के लड्डू फूट रहे थे। वह तरह-तरह की कल्पनाओं में खोया हुआ था। वह सोचता जा रहा था कि कल सुबह वह नए कपड़े पहनकर ईदगाह जाएगा। अपने दोस्तो से मिलेगा। उसके इतने अच्छे कपड़े देखकर सभी दोस्त दंग रह जाएंगे। इतने अच्छे कपड़े तो और किसी दोस्त के नहीं होंगे। वह सभी दोस्तों को बताएगा कि ये कपडे उसकी अम्मी ने दिलवाए हैं। इन्हीं खयालों में डूबा असलम रुपये लेकर तेज कदमों से चला जा रहा था।

अचानक असलम की चाल धीमी हो गई। वह कुछ उदास-सा हो गया। वह सोच में डब गया। उसके सामने कल स्कूल में घटित घटना घूम गई। कल स्कूल में मोहन कितना रो रहा था। उसे मास्टरजी ने साफ कह दिया कि अगर दो दिन के अंदर उसने फ़ीस जमा नहीं की तो उसका नाम स्कूल से काट दिया जाएगा।
मोहन असलम की ही कक्षा में पढ़ता था। वह पढ़ने में बहुत तेज़ था। मोहन असलम का पक्का दोस्त था। दोनों कक्षा में एक साथ ही बैठते थे। मोहन बहुत गरीब घर का लड़का था। उसके पिता मजदूरी करके किसी तरह मोहन को पढ़ाते और घर का खर्च चलाते थे। मोहन की माँ नहीं थी और न ही कोई भाई-बहन था।
पिछले दो महीने से मोहन के पिता बहुत बीमार चल रहे थे, जिससे वे काम पर नहीं जा पाते थे। घर में दवा के लिए पैसे भी नहीं थे। 

दो महीने से मोहन ने स्कूल की फ़ीस जमा नहीं की थी। और अब तो खाने के लिए भी घर में कुछ नहीं बचा था। अब उन बेचारों का क्या होगा। असलम सोचने लगा कि कितनी मेहनत से रात-दिन एक करके उसकी अम्मी ने रुपये इकटठे किए हैं और वह इन्हें नए कपड़े खरीदकर एक दिन की खुशी के लिए खर्च कर देगा। अगर वह ये रुपये मोहन को दे दे तो उसके पिता की जान बच सकती है, वह अनाथ होने से बच जाएगा। उसकी पढ़ाई भी चालू रह सकती है। उसकी जिंदगी सँवर सकती है और वह दर-दर की ठोकरें खाने से बच जाएगा। 

एक अच्छा दोस्त बिछुड़ने से बच जाएगा और अम्मी की मेहनत भी सफल हो जाएगी। ईद में अगर नए कपड़े नहीं पहने तो इससे क्या फर्क पड़गा। एक साल और पुराने कपड़ों से ईद मना लेंगे। मगर मोहन को अगर इस समय मदद न मिला तो उसकी दुनिया ही बदल जाएगी। यह सब सोचकर असलम तेजी से मोहन के
घर की तरफ़ चल दिया। मोहन रुआँसा-सा चारपाई के पास बैठा था। उसके पिता चारपाई पर लेटे हुए थे। असलम को देखकर मोहन की आँखें फिर भर आईं। 

असलम ने मोहन को ढाँढस बंधाया और उसे रुपये देते हुए बोला, “दोस्त, इन रुपय से अपने पिता का इलाज करवाओ और अपनी स्कूल की फ़ीस जमा करा।" 
असलम के पास इतने रुपये देखकर मोहन अवाक रह गया। असलम ने उसे समझते हुए कहा, “मोहन, ये रुपये बहुत ही मेहनत के हैं। मेरी अम्मी ने मुझे नए कपड़े खरीदने के लिए दिए थे। लेकिन इन रुपयों का इससे अच्छा दूसरा कोई उपयोग नहीं हो सकता।”

मोहन ने बहुत इनकार किया पर असलम नहीं माना। उसने ज़बरदस्ती मोहन की जेब में रख दिए। मोहन अपने आपको रोक नहीं सका। वह असलम से लिपटकर रोने लगा। उसे ऐसा लग रहा था, जैसे असलम के रूप में भगवान स्वयं उसकी मदद के लिए आए हों। असलम जब वापस अपने घर पहुंचा तो उसकी अम्मी उसे खाली हाथ आया देखकर हैरान रह गईं। असलम ने जब पूरी बात अपनी अम्मी को बताई तो उनकी आँखें छलछला आईं। उन्होंने असलम को अपने सीने से लगा लिया। उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। उन्हें अपने इस नन्हे, लेकिन विचरो से बहुत बडे, बेटे पर नाज़ होने लगा। वे बार-बार असलम का मुँह चूमने लगीं। असलम का भी अपनी ऐसी अम्मी पर नाज़ हो रहा था।

उस रात असलम ने एक सपना देखा। उसने देखा कि अल्लाह उसके पास खुद चलकर आए हैं और उससे कह रहे हैं, "असलम, तुम एक नेक इनसान हो! तुम मेरे बेटे हो! मैं तुमस प्यार करता हूँ! सच्ची ईद तुम्हीं ने मनाई है।"


लेखक - श्री मुरलीधर

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